अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू
मेरे अजीज़ दोस्तों ! आज का यह पोस्ट शब्र और अच्छे अख्लाक के बारे में है । आज हम मुसलमानों में शब्र करने की ताकत ही नहीं है । लोग तुरंत अपने ईमान को शक की निगाह से देखने लगते हैं । लेकिन इस पोस्ट के ज़रिये हमने आपको इस्लाम में शब्र करने की फजीलत के बारे में बताएंगे । इस पोस्ट को दूसरों तक भी जरूर शेयर करें क्योंकि आज के दौर में मुसलमानों को दिलों में शब्र कम होता जा रहा है ।
अपने इस पोस्ट की शुरूआत हम कयामत के दिन से करना चाहेंगे ।
कयामत के दिन जब सारे मर्द-औरत जमा किये जाएंगे । उस वक्त ऐलान किया जाएगा - “ शब्र वाले खड़े हो जाओ ।” ये सुनकर मर्द और औरतों की एक छोटी सी जमात खड़ी होगी । आवाज आएगी - “ चलो जन्नत में जाओ ।”
लेकिन अल्लाह तआला उनको यूं ही जन्नत में नहीं भेजना चाहते हैं बल्कि वो सारे दुनिया वालों के सामने उनको हाइलाइट करने के बाद जन्नत में भेजना चाहते हैं । लिहाज़ा थोड़ी दूर पर उनको कुछ फरिश्ते रोक लेंगे और कहेंगे - “ रुको भाई ! आप लोग कहां जा रहे हो ?” वो लोग जवाब देंगे कि हमलोग जन्नत में जा रहे हैं । फिर वो फरिश्ते कहेंगे - “ अरे भाई ! अभी तो हिसाब शुरू ही नहीं हुआ । तुम्हें किसने कहा जन्नत में जाओ ? पहले हिसाब दो फिर जाना जन्नत में ।” फरिश्ते की ये बात सुनकर वो फिर से जवाब देंगे - “ भाई हमारा हिसाब है ही नहीं । हम बेहिसाबी लोग हैं ।” ये सुनकर फरिश्ता हैरानी से पूछेगा - “ अरे आप कौन लोग हैं ? ” वो लोग कहेंगे - “जानते नहीं हो ? हम शब्र वाले हैं ।” अब ये फरिश्ते कहने लगेंगे - “ अच्छा अच्छा ! तो तुम शब्र वाले हो ! ठीक है भाई जाओ जाओ ।” ये शब्र वालों का मर्तबा है ।
[ इन सारी बातों को मैदान में खड़े सारे लोग देखेंगे और सुनेंगे क्योंकि अल्लाह तआला सबके सामने उनको हाइलाइट करना चाहते हैं । ]
मेरे दोस्तों ! जिंदगी में हुस्न शब्र और बर्दाश्त से आता है । गुस्से से नहीं आता । अगर आपकी भी फैमिली है और आप अपने घरों में खुशियां देखना चाहते हैं तो अपने अख्लाक ठीक कर लें बर्दाश्त करना सीखें । माफ करना सीखें । ये दो वो शिफात हैं जिससे आपका घर आबाद हो जाएगा । आपके बच्चे खुश, आपकी बीवी खुश , बीवी का खामिद खुश, बहन-भाई खुश , मां-बाप खुश, सारे लोग खुश रहेंगे । लेकिन जब बर्दाश्त करने की ताकत निकल जाती है तो सारा मुआशरा एक आग में आ जाता है ।
मेरे नबी (स.अ.व) ने फरमाया : ईमान है - सब्र करना और माफ करना ।
एक बार आप (स.अ.व) खाना खा रहे थे तभी एक तवाइफ गुजरी । उसने आप (स.अ.व) पर तंज किया - “ कैसा नबी है जो अकेले अकेले रोटी खाता है और किसी को पूछता भी नहीं ।” आप (स.अ.व) ने कहा - “ आओ बैठो तुम भी खा लो ।” ये कहकर उसको अपने सामने बैठा लिया । वो तो केवल आप (स.अ.व) को ताना दे रही थी उसे भूख नहीं थी । इसीलिए उसने आप (स.अ.व) को मज़ीद चिढ़ाने के लिए कहा - “ मैं ऐसे नहीं खाउंगी । जो तेरे मुंह में है वो निकाल के मुझको खिला ।”
उसका ये सोचा था कि अब ये नाराज होकर मुझे जाने को कहेंगे । लेकिन आप (स.अ.व) ने फरमाया - “ मैं हाजिर हूँ ।” और जो निवाला उनके मुंह में था उसे बाहर निकाला और अपने हाथों से उस औरत के मुंह में डाल दिया । जैसे ही आप (स.अ.व) का लुकमा उसके मुंह के अंदर गया तो उसने कलिमा पढ़ ली । और मक्के की सबसे हया वाली ख्वातीन में उसका शुमार होने लगा । [ मेरे भाईयों ! ये मेरे नबी की ज़िन्दगी है । ]
एक छोटा वाकिया
अब्दुल्लाह बिन उबैई मुनाफिकीनों का सरदार था । जिसने सबसे ज्यादा हुजूर (स.अ.व) को तकलीफ पहुंचाई थी ।
एक बार अल्लाह के नबी (स.अ.व) पानी पी रहे थे । तभी अब्दुल्लाह बिन उबैई का एक बेटा आप (स.अ.व) के पास आया और कहने लगा - “ या रसूलुल्लाह (स.अ.व) ! थोड़ा पानी बचा दीजिए ।” आपने पूछा - “क्या करोगे ?” वो कहने लगा - शायद मेरा बाप ये पानी पीकर मुसलमान हो जाए ।” आप (स.अ.व) ने कहा - “ हां भाई ! ये ले जाओ ।”
वो उस गिलास को लेकर अपने बाप के पास आया और कहा - “ अब्बा ये पानी पी लो ।” उसके बाप अब्दुल्लाह बिन उबैई ने पूछा - इसमें क्या है ? तो उसके बेटे ने जवाब दिया - ये अल्लाह के नबी का बचा हुआ पानी है । पी ले शायद तेरे अंदर ईमान आ जाएगा ।” वो कहने लगा - “ जाओ ! और वहां से किसी का पेशाब ले आओ । मैं वो पी लूंगा लेकिन ये नहीं पीऊंगा ।” ये सुनकर उसके बेटे को बड़ा गुस्सा आया । वो वापस गए और कहने लगे - “ या रसूलुल्लाह (स.अ.व) ! ये पक्का मुनाफिकीन है , बदबख्त है ! मुझे इजाजत दें मैं इसकी गर्दन उड़ाता हूँ ।” आप (स.अ.व) ने फरमाया - “ वो तेरा बाप है जाओ उसकी खिदमत करो ।” [ ये मेरे नबी के अख़्लाक थे । ]
आज इस्लाम सिर्फ हज, उमरा, नमाज और रोजे तक ही रह गया है । जिसने नमाज को छोड़ा उसने पूरे दीन को तबाह व बर्बाद कर दिया और जिसने नमाज को कायम किया उसने पूरे दीन को कायम किया ।
सबसे अव्वल दर्ज़े का इस्लाम क्या है ?
एक बार किसी ने आप (स.अ.व) से पूछा कि सबसे अव्वल दर्ज़े का इस्लाम क्या है ? आप (स.अ.व) ने फरमाया : “ जो हाथ और ज़बान से किसी को तकलीफ न पहुंचाए वो सबसे आला दर्ज़े का मुसलमान है ।”
कुर्बान जाऊं मेरे नबी के अख्लाक पर ; जिन्दगी भर मेरे नबी ने किसी को थप्पड़ नहीं मारा । न ही किसी को ज़बान से ऐसा जुमला फरमाया जिससे वो कहने लगे : मेरा दिल टूट गया । मेरा दिल बैठ गया ।”
मेरे भाईयों ! मेरी हाथ जोड़ कर आपसे गुजारिश है , शब्र करना सीखो । आजकल आपने सुना ही होगा कि आर्मेनिया को जंग में हराकर कर इस्लामी मुल्क अज़रबैज़ान जंग जीत गया । दोस्तों इसकी तारीख भी बेहद अजीब है ।
जब 1994 में आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच जंग खत्म हुआ था तब आर्मेनिया ने अज़रबैज़ान के काराबाख़ इलाके को अपने कब्ज़े में कर लिया था । काराबाख़ के इस इलाके में दर्जनों मस्जिदें थी । लेकिन यहूदियों ने उन सारी मस्जिदों को शहीद कर दिया था । सिर्फ एक मस्जिद बाकी रह गई थी क्योंकि वो मस्जिद पुराने जमाने में बनी थी और हद से ज्यादा मज़बूत बनी थी । इसीलिए वो उसे शहीद करने में नाकाम रहे । लेकिन फिर उन्होंने उस मस्जिद को सुअर के बाड़े में तब्दील कर दिया था । और उस खूबसूरत मस्जिद में सुअर पाले जाने लगे थे ।
अब उसी काराबाख़ को वापस जीतकर अज़रबैज़ान ने अपनी मस्जिदों और उस इलाके को फिर से बेहतरीन बनाना शुरू कर दिया है ।
मीडिया से बात करते हुए अज़रबैज़ान के राष्ट्रपति इल्हाम अली ने कहा कि वो काराबाख़ के लिए बेहद परेशान थे । उन्होंने मदीना में भी उस मस्जिद और उस जगह को आजाद कराने के लिए अल्लाह से मदद मांगी थी ।
बताया जाता है कि जंग जीतने के बाद इल्हाम अली अपनी बीवी के साथ उस मस्जिद में गए और वहां कुरआन शरीफ रखा । वो कुरआन शरीफ मदीना से लाया गया था । अभी वहां काम जोर-शोर से जारी है ।
दोस्तों ! इस घटना को बताने का मेरा मकसद यह था कि जिस तरह काराबाख़ की उस मस्जिद को 26 साल बाद इंसाफ मिला ठीक उसी तरह आपको भी इंसाफ मिलकर रहेगा । बस थोड़ी शब्र की जरूरत है । मेरा खुदा किसी से नाइंसाफी नहीं करता । आपको बस उस पर यकीन रखने की जरूरत है ।
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मैं आपसे फिर मिलूंगा एक नए पोस्ट में तबतक के लिए : अल्लाह हाफिज़ !


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