अल्लाह तआला की किताबें । Books Of Allah - Quran Hadees

इस्लामी अकीदों में बताया गया है कि कुरआन मज़ीद तेइस ²³ साल में उतरा ।


कुरआन मज़ीद में खुदा तआला ने फरमाया है :-

“ शहरु रमज़ानल-लज़ी उनज़िल फीहिल कुरआन ”

तर्जुमा : रमज़ान का महीना वह महीना है जिसमें कुरआन मज़ीद नाजिल किया गया । इस बात से ये मालूम होता है कि कुरआन मज़ीद रमज़ान के महीने में उतरा ।


वहीं कुरआन मज़ीद में ही दूसरी जगह फरमाया गया  है : “ इन्ना अन्ज़लना हु फ़ी लै-लतिल क़द्रि ”

तर्जुमा : हमने इस (कुरआन मज़ीद) को शब-ए-कद्र में उतारा ।


ऐसे में लोग ये कहते हैं कि ये तीनों बातें एक-दूसरे के खिलाफ हैं । लेकिन हकीकत में तीनों बातें सही हैं । कुरआन मज़ीद के दो नुज़ूल हैं ।


पहला नुज़ूल : सबसे पहले सारा कुरआन मज़ीद एक ही बार लौह-ए-महफूज़ से आसमान-ए-दुनिया यानी पहले आसमान पर नाज़िल किया गया ।

दूसरा नुज़ूल : वक्त वक्त पर जरूरतों के लिहाज से थोड़ा-थोड़ा दुनिया में उतारा गया ।


खुलासा : जब कुरआन मज़ीद को पहले आसमान पर नाज़िल किया गया तो वह रमज़ान का महीना था और जिस दिन नाज़िल किया गया वो शब-ए-कद्र था । इस तरह अल्लाह तआला ने सच फरमाया है कि हमने इसे रमज़ान के महीने में शब-ए-कद्र में उतारा ।


ठीक इसी तरह तेइस साल में नाजिल होने के मतलब ये है कि पहले आसमान से हुजूर (स.अ.व) पर कुरआन मज़ीद तेइस साल में नाज़िल किया गया ।


इन दलीलों से ये साबित होता है कि ये तीनों बातें एक दूसरे के खिलाफ नहीं है बल्कि तीनों सही हैं ।


कुरआन मज़ीद के नुज़ूल की शुरूआत कहां से हुई ?


सवाल : किस जगह से कुरआन मज़ीद उतरना शुरू हुआ ?

जवाब : मक्का मुअज्ज़मा में एक पहाड़ है । उसमें एक गार है जिसका नाम “ग़ार-ए-हिरा” है । हुज़ूर रसूल करीम (स.अ.व) उस गार में खुदा तआला की इबादत के लिए तशरीफ ले जाते थे और कई-कई दिन तक उसमें रहते थे । जब खाना खत्म हो जाता था तो मकान पर तशरीफ लाते और फिर से कई दिन का सामान ले जाते और तन्हाई में खुदा तआला की इबादत करते रहते । उसी गार में हुज़ूर (स.अ.व) पर कुरआन मज़ीद उतरना शुरू हुआ था ।


कुरआन मज़ीद के नुज़ूल की शुरूआत कैसे हुई ?


हुज़ूर (स.अ.व) उसी गार-ए-हिरा में तशरीफ फरमा रहे थे कि हजरत ज़िब्रईल अलैहिस्सलाम आये और आपके सामने ज़ाहिर होकर आप से फरमाया : “ ईक़रअ ”

यह लफ्ज़ सूरह अलक का पहला लफ्ज़ है और इसका मतलब है “ पढ़ ” । आप (स.अ.व) ने फरमाया कि “ मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ ।” यह तीन बार हुआ । फिर हजरत ज़िब्रईल अलैहिस्सलाम ने ये आयतें पढ़ीं :


“ इक़रअ बिस्मि रब्बि कल्लज़ी ख़लक । ख़ल्कल इन्सा-न मिन-अलक़ । इक़रअ व रब्बु कल अक-रमुल्लज़ी अल्ल-म-बिल क-़ल-मि , अल्लमल इन्सा-न मालम यअलम । ”


ये आयतें सुनकर हजरत मुहम्मद मुस्तफा (स.अ.व) ने भी पढ़ लीं । बस ये आयतें कुरआन मज़ीद में सबसे पहले हुज़ूर (स.अ.व) नाज़िल हुई हैं ।


अल्लाह तआला की किताबें । Books Of Allah - Quran Hadees

कुरआन मज़ीद की तरतीब सही है या नहीं ?


नहीं ! मौजूदा तरतीब नुज़ूल की तरतीब नहीं है । कुरआन मज़ीद का नुज़ूल तो जरूरत और मौके के लिहाज़ से होता था । मगर जब कोई सूरह उतरती थी तो हुजूर रसूल करीम (स.अ.व) बता देते थे कि इस सूरह को फलां सूरह से पहले लिख लो और जब कोई आयत या आयातें नाज़िल होती थीं तो हुजूर (स.अ.व) फरमा देते थे कि इस आयत या इन आयातों को फलां सूरह की फलां आयत के बाद या फलां आयत से पहले लिख लो । बस अगरचे कुरआन मज़ीद का नुज़ूल तो मौका और ज़रूरत के लिहाज़ से इस मौजूदा तरतीब के खिलाफ हुआ है । लेकिन यह मौजूदा तरतीब भी हुज़ूर (स.अ.व) की बताई हुई है औऱ हुज़ूर के इरशाद और हुक्म के मुताबिक कायम की हुई है ।


सवाल : हुज़ूर (स.अ.व) ने जिस तरतीब से कुरआन लिखवाया था और जो तरतीब आपने कायम फरमाई थी ये खुद आपकी राय थी या खुदा तआला के हुक्म के मुताबिक आप बताते थे ।

जवाब : सूरतों की तादाद, उनकी इब्तिदा और इन्तिहा, हर सूरह की आयतों की तादाद, हर आयत की इब्तिदा और इन्तिहा और इसी तरह पूरे कुरआन मज़ीद की तरतीब खुदा तआला की तरफ से हज़रत ज़िब्रईल अलैहिस्सलाम को मालूम हुई और उन्होंने हुजूर (स.अ.व) को बताई और हुज़ूर (स.अ.व) के ज़रिये से हमें मालूम हुई है ।


कुरआन के बदले न जाने की क्या दलील है ?


सवाल : कुरआन मज़ीद को उतरे हुए चौदह सौ साल से ज्यादा हो गए हैं । फिर इस बात की क्या दलील है कि जो कुरआन मज़ीद हमारे पास है ये वही कुरआन मज़ीद है जो हुज़ूर (स.अ.व) पर नाज़िल हुआ ?

जवाब : इस बात की बहुत सारी दलीलें हैं । जिनमें से कुछ आसान दलीलों को हम नीचे बयान कर रहे हैं :


1. पहली दलील : कुरआन मज़ीद आज दुनिया भर में पढ़ी जाती हैं । ये सारी किताबें उन्हीं किताबों से नकल की गई हैं जो हुजूर (स.अ.व) के दौर में तैयार की गई थीं । इनमें किसी भी तरह की फेरबदल नहीं की गई है । कुरआन मज़ीद को हुज़ूर (स.अ.व) के ज़माने से इतनी कसरत से लोग नकल करते और पढ़ते-पढ़ाते चले आ रहे हैं कि कम से कम अक्ल वाला आदमी भी ये यकीन नहीं कर सकता है कि इतने सारे लोग झूठ बोलते होंगे ।


2. दूसरी दलील : हजरत मुहम्मद मुस्तफा (स.अ.व) के ज़माने से आज तक लाखों ही नहीं बल्कि करोड़ों मुसलमान कुरआन मज़ीद के हाफिज़ होते चले आये हैं और आज भी पूरी दुनिया में लाखों बच्चों, जवानों और बूढ़ों के सीने में कुरआन मज़ीद महफूज़ है ।

ऐसे में जिस किताब के नुज़ूल के वक्त से आज तक इतने हाफिज़ मौजूद रहे हों और उन्होंने अपने सीनों में इसकी हिफाज़त की हो उस किताब के महफूज़ और असली होने में कोई शुबह नहीं हो सकती है ।


3. तीसरी दलील : खुद कुरआन मज़ीद में ही खुदा तआला ने फरमाया है : “ इन्ना नहनु नज़्ज़ल-नज़-ज़िक-र व इन्ना लहू ल-हाफिज़ून । ” [ सूरह हज़र, रु. 1 ] ।

तर्ज़ुमा : “ यकीनन हमने ही कुरआन मज़ीद को उतारा है और हम ही उसके मुहाफिज़ हैं । ”

जब अल्लाह तआला ने कुरआन मज़ीद की हिफाज़त की ज़िम्मेदारी खुद पर ली है तो यह साबित करता है कि कोई भी ताकत इस कलाम को नहीं बदल सकती । ये कयामत तक महफूज़ रहेगा ! [ इंशाअल्लाह ]


4. चौथी दलील : कुरआन मज़ीद ने अपने नुज़ूल के वक्त जो दावा किया था कि उस जैसा कलाम कोई शख्स नहीं बना सकता, यह दावा आज तक इस कुरआन मज़ीद के बारे में सही रहा है । क्योंकि जो कुरआन मज़ीद आज मौजूद है उसका मिस्ल ना कोई शख्स बना सका, ना बनाने का दावा किया है, ना बना सकता है और ना ही बना सकेगा ।

यह इस बात की खुली दलील है कि यह कुरआन मज़ीद वही कलाम है जो हुज़ूर (स.अ.व) पर नाज़िल हुआ था ।




मेरे अज़ीज़ दोस्तों ! उम्मीद है कि आज के इस पोस्ट से आपको काफी कुछ सीखने को मिला होगा । इस पोस्ट को सदका-ए-जा़रिया की नियत से अपने वाट्सएप और फेसबुक ग्रुपों में भी जरूर शेयर कीजिएगा । हमारी कोशिश ये है कि इस्लाम से जुड़ी बातों का इल्म हम मुस्लिमों के साथ-साथ गैरमुस्लिमों तक भी पहुंचा पाएं । तो ऐसे में हमें सपोर्ट करना न भूलें । आपकी छोटी सी मदद भी हमारे बेहद काम आएगी । 

हम आपसे फिर मिलेंगे किसी ऐसे ही बेहतरीन पोस्ट में…. तबतक के लिए अल्लाह हाफिज़ !


Post a Comment